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Note ban crisis
Note ban crisis

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नवंबर को 500 और 1000 के नोट बंद करने का अचानक फैसला ले लिया। जिससे देश में तूफान आ गया है। कहीं लोग भूखों मर रहे हैं तो कहीं बैंकों की लाइन में तड़पकर मर रहे हैं। वहीं नोटबंदी का सबसे ज्यादा असर किसानों और कारोबारियों पर हुआ है। देश की ज्यादातर मंडियों में नोट न होने की वजह से मंदी का असर आ गया है। सरकार ने 1000 और 500 के नोट तो बंद कर दिए लेकिन 2000 की नोट चलाकर और बड़े संकट उत्पन्न कर दिए। कारोबारियों के पास किसी तरह लोग 2000 के नोट तो लेकर जा रहे हैं लेकिन उसके छुट्टे न होने की वजह से कारोबारियों के सामने बड़ी समस्या उत्पन्न हो गई है। जिससे अब उनके सामने अपने कारोबार बंद करने की नौबत आ गई है।

फलों की बात करें तो टिकाऊ फलों के दाम में बढ़ोतरी हुई है, जबकि कच्चे फलों व सब्जियों के दाम में कमी आई है। कच्चे फलों व सब्जियों के रेट में गिरावट आने से किसान और छोटे व्यापारी परेशान है। वहीं ज्यादा टिकाऊ फलों के रेट सामान्य चल रहे हैं, जबकि सेल पर काफी असर पड़ा है। खुदरा मंडियों व दुकानों पर फल सब्जी खरीदने वाले ग्राहकों की तादाद कम होने से दुकानदार थोक मंडी से खपत के मुताबिक ही सौदा खरीद रहे है।

नोट बंदी का प्रभाव इतना पड़ा है कि अब किसान भी सब्जियां लेकर मंडी में कम आ रहे है। वहीं थोक फल व्यापारी भी कम मात्रा में ही फल मंगवा रहे है। हजार-पांच सौ का नोट बंद होने से किसान व व्यापारी पुराने रुपये लेने से इनकार कर रहे है। दो हजार के नोटों का खुले नहीं मिलने से कारोबार पर काफी असर पड़ा हैं।

नोटबंदी का असर दवा कारोबारियों पर भी पड़ा है, जो इस वक्त नोटबंदी के चलते भारी मुसीबत झेल रहे हैं। इस वक्त बीमार पड़ना भी खतरे से खाली नहीं क्योंकि बाजार में अब दवाओं की भी किल्लत होने लगी है। दरअसल दवा व्यापारी पुराने नोट ले रहे हैं लेकिन आगे नहीं चला पा रहे हैं। थोक दवा व्यापार में पुराने नोट नहीं चल रहे हैं, ऐेसे में दवा व्यापारियों को पेमेंट का टेंशन हो रहा है।

नोट बैन का एग्री बिजनेस पर बहुत बुरा असर पड़ा है। कहीं मंडियों में ऑक्‍शन बंद है तो कहीं किसानों का माल खराब हो रहा है। किसानों को नई फसल और खर्च के लिए कैश चाहिए इसलिए सभी काम रुके हैं। यूपी में गुड़ इंडस्‍ट्री ठप है तो अब राजस्‍थान की दाल मिलें भी बंद हो गई हैं। किसान तो कैश न मिलने से परेशान है ही साथ ही साथ एग्रीकल्‍चर से जुड़ा हर व्‍यापारी समस्‍याओं से घिर गया है।
हिमाचल प्रदेश की सबसे बड़ी कृषि उपज सब्जी मंडी में नोटबंदी के चलते कारोबार पचास फीसदी तक गिर गया है। सालाना 400 करोड़ का कारोबार करने वाली सोलन की इस मंडी में आढ़तियों और किसानों को काफी परेशानी हो रही है। प्रदेश के अन्य जिलों के किसान पैदावार लेकर मंडी तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। आसपास के क्षेत्रों से जो पैदावार लेकर आ रहे हैं उन्हें देने के लिए आढ़तियों के पास 100, 50 या 2000 के नोट नहीं हैं।

दुकान मालिक कहते हैं कि दुकान बंद करने की नौबत आ गई है। सामान न तो किसान ला रहे हैं न ही उन्हें पेमेंट करने के लिए पैसे हैं। चेक भी तभी देंगे जब अकाउंट में पैसा है। अब तक पूरा दिन बेकार निकला है।

नोट बंदी का असर कारोबार और कारोबारी ही पर नहीं है। नोट बंदी का व्यापक असर गांव गांव में देखने को मिल रहा है। किसान न बैंकों में अपने बड़े नोट जमा कर पा रहा है और न ही जरूरी खर्चों के लिए नोट बदल पा रहा है।

किसानों को ग्रामीण आंचल में संचालित बैंक शाखाओं से न तो पर्याप्त नकदी बदल पा रही है और न हीं उनके नोट जमा हो पा रहे हैं। गल्ला मंडी में 9 नवंबर से कारोबार ठप है। कृषि विभाग के केंद्रों पर गेहूं के बीज की उपलब्धता है लेकिन 500 और 1000 के नोट बीज केंद्रों पर स्वीकार नहीं किए जा रहे। कृषि विभाग ने तो 500 और 1000 के नोट स्वीकार न करने के संबंध में नोट भी चस्पा कर रखा है। किसान बैंकों में कतार लगाए हैं लेकिन बैंकों में नकदी का संकट है जिससे किसानों केा नोट बदलने में सफलता नहीं मिल रही।

नोटबंदी के दस दिन बाद भी देश में बैंकों और एटीएमओं पर भीड़ कम नहीं हो रही, लंबी लंबी कतारें अब भी लगी हैं। जबकि प्रशासन ने कहा है कि नकद की कमी की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है और अब अफरा-तफरी नहीं है।

संसद के अंदर और बाहर नोटबंदी के बीच राजनीतिक रस्साकशी जारी रहने के बीच बैंक अपनी शाखाओं पर 500 और 1000 रुपये के पुराने नोटों को बदलवाने और अपनी रोजाना जरूरतों की पूर्ति के लिए पहुंच रही भीड़ का प्रबंधन करने की जददोजहद में लगे रहे। हालांकि कुछ एटीएम में 500 रुपये के नोट देने के लिए जरूरी तब्दीली की गई लेकिन पैसे निकालने के भारी दबाव के चलते ऐसी मशीनों में नकदी जल्द खत्म हो रही है।

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